दिल्ली। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के मोहाली स्थित नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान – INST के वैज्ञानिकों ने लोहे से बने सूक्ष्म, स्पंज जैसी संरचना, आयरन मेटल-ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क नैनोस्फीयर का उपयोग कर एक सेंसर विकसित किया है।
वैज्ञानिकों ने सॉल्वोथर्मल विधि से लोहे के आयनों और कार्बनिक अणुओं से बनी छिद्रपूर्ण, अत्यधिक संरचित सामग्री नैनोस्फीयर का संश्लेषण कर उनकी सुरक्षा एवं प्रभावशीलता का परीक्षण किया है। सूक्ष्म छिद्रों से भरा यह पदार्थ निकोटीन जैसे अणुओं को फंसा सकता है।
इंट्रासेल्युलर इमेजिंग और कॉन्फोकल माइक्रोस्कोपी का उपयोग कर कोशिकीय अवशोषण का अध्ययन करते हुए वैज्ञानिकों ने पाया कि जब निकोटीन या कोटिनिन जैसे अणु छिद्रों में प्रवेश करते हैं, तो नैनोस्फीयर नीले रंग की ओर बदलाव के साथ अधिक चमकीला होने लगता है।
नैनोस्केल नामक पत्रिका में प्रकाशित नैनोस्फीयर को अत्यधिक चयनात्मक पुनर्चक्रणीय पाया गया है। अनुसंधान से पता चला है कि होस्ट-गेस्ट (मेजबान पदार्थ) की अंतःक्रियाओं और इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण के कारण प्रतिदीप्ति बढ़ जाती है, जिससे एक मजबूत उत्सर्जन संकेत प्राप्त होता है। इसका संचालन भी सरल है और यह जलीय माध्यम में काम करता है।
आयरन की प्रचुर मात्रा लौह आधारित इस विधि को सुविधाजनक, सुरक्षित विकल्प बनाती है जो गैर-आक्रामक स्वास्थ्य निगरानी, धूम्रपान, व्यसन और मेटाबॉलिज्म (उपापचय) से संबंधित चिकित्सा और अनुसंधान अध्ययनों जैसे जैविक अनुप्रयोगों हेतु उपयुक्त है। साथ ही कम विषाक्तता और उच्च जैव अनुकूलता के कारण कम लागत वाले संवेदन किटों के विकास और सुरक्षित जैविक पहचान के लिए भी उपयुक्त है।
यह विधि सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी और धूम्रपान बायोमार्कर स्क्रीनिंग, तंबाकू के संपर्क में आने की त्वरित और कम लागत वाली जांच और अन्य बायोमार्करों के लिए फ्लोरोसेंट एमओएफ-आधारित बायोसेसिंग प्लेटफॉर्म विकसित करने में सहायक हो सकता है।